विज्ञापन

धू-धू कर जल रहे हैं जंगल और जल रहा है हमारा भविष्य, इन्हें बचाइए

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  

हाल ही में अमेज़न के जंगलों में भीषण आग लग गयी। कितनी ही वन-संपदा का नुकसान हमने झेला। जंगलों से उठते धुएं में हमारा भविष्य भी जल रहा है, उसे बचाना होगा। इन जंगलों का, हमारी प्रकृति का संरक्षण करना होगा। वरना परिणाम अति भयंकर व विनाशकारी होंगे। प्रकृति है तो जीवन है इसलिए हमारे कवियों ने इस संदर्भ में कई कविताएं लिखीं हैं।

महाकवि दिनकर तो वृक्षों को विश्व का पहला काव्य मानते हैं

पहली पंक्ति लिखी विधि ने जिस दिन कविता की
उस दिन पहला वृक्ष स्वयं उत्पन्न हो गया
प्रथम काव्य है वृक्ष विश्व के पहले कवि का

(२)
द्रुमों को प्यार करता हूँ।
प्रकृति के पुत्र ये
माँ पर सभी कुछ छोड़ देते हैं,
न अपनी ओर से कुछ भी कभी कहते।
प्रकृति जिस भाँति रखना चाहती
उस भाँति ये रहते।

विज्ञापन

वन की प्रकृति वामा / केदारनाथ अग्रवाल

हास-हर्ष-हुलास की यह हरी जाया
फूल-फल से, रूप-रस से भरी काया
पात-पात प्रकाश-दीपित प्रकृति वामा
वात-वास-विलास-जीवित सुरति श्यामा
हर रही दव, कर रही संभूत माया
परस अपरस-विरस पर कर रही दाया
जठर जड़ भी चलित चित चैतन्य होते
देखते ही चूमते छवि, धन्य होते
गमक अग का मदन-मद-सा विपुल बहता
पवन पथ का कथन मधु का अतुल कहता
अयन छवि के नयन अन्तर्नयन खुलते
वनज-वन के सदल सम्पुट वदन खुलते 

यह धरती कितना देती है / सुमित्रानंदन पंत

यह धरती कितना देती है! धरती माता 
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्व को
बचपन में छिः स्वार्थ लोभ वश पैसे बोकर
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ
इसमें सच्ची समता के दाने बोने है
इसमें जन की क्षमता का दाने बोने है
इसमें मानव-ममता के दाने बोने है
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलें 
मानवता की - जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंग

सृष्टि पर पहरा (कविता) / केदारनाथ सिंह

जड़ों की डगमग खड़ाऊं पहने
वह सामने खड़ा था
सिवान का प्रहरी
जैसे मुक्तिबोध का ब्रह्मराक्षस-
एक सूखता हुआ लंबा झरनाठ वृक्ष
जिसके शीर्ष पर हिल रहे
तीन-चार पत्ते

कितना भव्य था
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना

उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते


साभार- कविताकोश 

7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Sarthak Piyush

28 कविताएं

View Profile

Nidhhi Mukesh

22 कविताएं

View Profile