विज्ञापन

आज का शब्द- गुंजन और सुमित्रानंदन पंत की एक मशहूर कविता...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- 'गुंजन' जिसका अर्थ है- गुंजार, गुनगुनाना, भौंरे का गुंजार, गूंजने का शब्द। प्रस्तुत है सुमित्रानंदन पंत की कविता- वन-वन, उपवन...

वन-वन, उपवन-- 
छाया उन्मन-उन्मन गुंजन, 
नव-वय के अलियों का गुंजन! 
विज्ञापन

रुपहले, सुनहले आम्र-बौर, 
नीले, पीले औ ताम्र भौंर, 
रे गंध-अंध हो ठौर-ठौर 
उड़ पाँति-पाँति में चिर-उन्मन
करते मधु के वन में गुंजन !

वन के विटपों की डाल-डाल 
कोमल कलियों से लाल-लाल, 
फैली नव-मधु की रूप-ज्वाल, 
जल-जल प्राणों के अलि उन्मन
करते स्पन्दन, करते-गुंजन !

अब फैला फूलों में विकास, 
मुकुलों के उर में मदिर वास, 
अस्थिर सौरभ से मलय-श्वांस, 
जीवन-मधु-संचय को उन्मन
करते प्राणों के अलि गुंजन !
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

TATA VENKAT SRINIVAS

29 कविताएं

View Profile