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सियासत: समाज को आईना दिखाते 21 शेर

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                            कहां तो यह तय था चिराग़ां हर एक घर के लिए 
        
                                                    
                            
कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए 
दुष्यंत कुमार

यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने यहां पर किस तरह का जलसा हुआ होगा
दुष्यंत कुमार

कच्चे मकान जिनके जले थे फ़साद में
अफ़सोस उनका नाम ही बलवाइयों में था
नईम जज़्बी

जंग में कत़्ल सिपाही होंगे
सुर्खरु ज़िल्ले इलाही होंगे
मौज रामपुरी

घरों पर नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
बशीर बद्र

शायद मुझे निकाल कर पछता रहे हैं आप
महफ़िल में इस ख़्याल से फिर आ गया हूं मैं
अदम

ऐ क़ाफ़िले वालों, तुम इतना भी नहीं समझे
लूटा है तुम्हे रहज़न ने, रहबर के इशारे पर 
तरन्नुम कानपुरी

जिसके किरदार पे शैतान भी शर्मिंदा है 
वो भी आये हैं यहां करने नसीहत हमको
माजिद देवबंदी

इस बरस हमने ज़मीनों में धुंआ बोया है
फल नहीं आएंगे अब, शाख़ों पे बम आएंगे
राहत इंदौरी

हुकूमत से एजाज़ अगर चाहते हो
अंधेरा है लेकिन लिखो रोशनी है
अशरफ़ मालवी

सिर्फ बाक़ी रह गया बेलौस रिश्तों का फ़रेब
कुछ मुनाफिक हम हुए, कुछ तुम सियासी हो गए
निश्तर ख़ानकाही

इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा
निदा फ़ाज़ली

सरों पर ताज रक्खे थे क़दम पर तख़्त रक्खा था 
वो कैसा वक़्त था मुट्ठी में सारा वक़्त रक्खा था 
ख़ुर्शीद अकबर

सितम की इंतिहा पर चल रही है 
ये दुनिया किस ख़ुदा पर चल रही है 
खुर्शीद अकबर

तबाह कर दिया अहबाब को सियासत ने 
मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है 
शकील जमाली

कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर 
क्या हक़ीक़त है और सियासत क्या 
सागर ख़य्यामी

जाने कब इस में हमें आग लगानी पड़ जाए 
हम सियासत के जनाज़े को चिता कहते हैं 
ख़ालिद इरफ़ान

हमें तो अहल-ए-सियासत ने ये बताया है
किसी का तीर किसी की कमान में रखना
महबूब ज़फ़र

ख़ुद-कुशी करती है आपस की सियासत कैसे
हम ने ये फ़िल्म नई ख़ूब इधर देखी है
गोपालदास नीरज

जिस को अब भी हो सियासत पे यक़ीन
उस को ये मुल्क दिखाया जाए
रजनीश सचन

उस को मज़हब कहो या सियासत कहो
ख़ुद-कुशी का हुनर तुम सिखा तो चले
कैफ़ी आज़मी
 
8 वर्ष पहले
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