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उड़ी-हमला हुआ तो लब तलक खोले नहीं - बोलो : डॉ राहुल अवस्थी 

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  उड़ी-हमला हुआ तो लब तलक खोले नहीं - बोलो 
विपक्षी के लिये दो बोल भी बोले नहीं - बोलो

गंवाये लाल हमने यूं किसी से कम न था कोई
मगर बेशर्म आंखों में कहीं भी ग़म न था कोई

हमारे शेर जागे तो तुम्हारी बुझ गयी बाती
फटा क्या-क्या : कहें क्या-क्या- फटी आंखें, फटी छाती
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हमारी जीत से जैसे

हमारी जीत से जैसे तुम्हारी हार हो आयी
मिशन वाले सबूतों की तुम्हें दरकार हो आयी

चलो, लो दे दिये, बस ये बता दो-क्या करोगे अब
जियोगे या मरोगे या कि जी-जी कर मरोगे अब

अरे तुम तो सबूतों को भी पाके रो उठे-छी-छी
तुम्हें क्या होना था पर क्या से क्या ये हो उठे छी-छी

इरादे और वादे

इरादे और वादे ताक पर तो धर नहीं सकती
तुम्हारी तर्ह सेना बेहयाई कर नहीं सकती

मियां ! वो दिन गये अब अपनी सेना को न टोकेंगे
न रोकेंगे मिशन, जो भी मिलेगा, उसको ठोकेंगे

बजा ली बांसुरी बरसों

बजा ली बांसुरी बरसों बरस, अब चक्र धारेंगे
बहुत घुसपैठ कर ली अब इन्हें घुस करके मारेंगे

हमारे शौर्य का रथ रास्ते में रुक नहीं सकता
उठे कितना दुरंगा पर तिरंगा झुक नहीं सकता
8 वर्ष पहले
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