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रबीन्द्रनाथ ठाकुर की दो बेहतरीन रचनाएं...

रत्नेश मिश्र

Irshaad
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                                                  वे तुम्हें 
संपदा का समुद्र कहते हैं
कि तुम्हारी अंधेरी गहराइयों में 
मोतियों और रत्नों का खजाना है, अंतहीन।

बहुत से समुद्री गोताखोर
वह खजाना ढूंढ रहे हैं
पर उनकी खोजबीन में मेरी रूचि नहीं है
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तुम्हारी सतह पर कांपती रोशनी
तुम्हारे हृदय में कांपते रहस्य
तुम्हारी लहरों का पागल बनाता संगीत
तुम्हारी नृत्य करती फेनराशि
ये सब काफी हैं मेरे लिए

अगर कभी इस सबसे मैं थक गया
तो मैं तुम्हारे अथाह अंतस्थल में
समा जाउंगा
वहां जहां मृत्यु होगी
या होगा वह खजाना।

अंग्रेजी से अनुवाद - कुमार मुकुल

दूसरी कविता - अगर प्यार में और कुछ नहीं

अगर प्यार में और कुछ नहीं
केवल दर्द है फिर क्यों है यह प्यार ?
कैसी मूर्खता है यह
कि चूँकि हमने उसे अपना दिल दे दिया
इसलिए उसके दिल पर
दावा बनता है, हमारा भी
रक्त में जलती इच्छाओं और आँखों में
चमकते पागलपन के साथ
मरूथलों का यह बारंबार चक्कर क्योंकर ?

दुनिया में और कोई आकर्षण नहीं उसके लिए
उसकी तरह मन का मालिक कौन है,
वसंत की मीठी हवाएँ उसके लिए हैं,
फूल, पंक्षियों का कलरव सब कुछ 
उसके लिए है
पर प्यार आता है
अपनी सर्वगासी छायाओं के साथ
पूरी दुनिया का सर्वनाश करता
जीवन और यौवन पर ग्रहण लगाता

फिर भी न जाने क्यों हमें
अस्तित्व को निगलते इस कोहरे की 
तलाश रहती है ?

अंग्रेज़ी से अनुवाद : कुमार मुकुल
7 वर्ष पहले
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