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आग कुछ नहीं बोलती, प्रतीक्षा करती है किसी गृहिणी के हाथों की

रत्नेश मिश्र

Irshaad
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                                                  आग कुछ नहीं बोलती 
वह अपने को समेट कर
चुपचाप- माचिस की डिबिया में पड़ी होती है 
और प्रतीक्षा रहती है 
किसी गृहिणी के हाथों की 
जो उसे 
गरम-गरम रोटी में बदल देगी 
डाल देगी अगरबत्ती की सुगंध में 
और अंधेरे के सैलाब में 
फूलों के बंदनवार- सी चांग देगी यहां से वहा तक 

उसे प्रतीक्षा रहती है 
उन खुरदुरे हाथों की 
जो उसे दहकाकर शक्ल दे देंगे
हंसिया की, कुदाली की 
लोटे की, थाली की 
रेलगाड़ी की, जहाज़ की 
सन्नाटे में से उटने वाली आवाज़ की 
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आग कुछ नहीं बोलती
वह सोयी रहती है पेड़ों के भीतर 
उसकी लाली- सी 
और प्रतीक्षा रहती है वसंत की 
जो उसे छूकर 
लहका देगा अनंत रंगों के फूलों में 
और ज़मीन धीरे-धीरे 
फलों और फ़सलों से कसमसाने लगेगी 
ज़िंदगी का गीत गुनगुनाने लगेगी 

आग सोयी रहती है 
बच्चों के होठों में 
जब कोई क्षण साथी गुदगुदाकर 
उसे जगा देता है 
तो दूधिया हंसी बनकर फैल जाती है 
भीगे होठों पर 
मासूम आंखों में 

कैसा लगता होगा उसे 
जब कोई हाथ 
उसे जगाकर डाल आता होगा 
असहाय झोंपड़ियों के बीच 
या झोंक देता होगा 
जब उसे किसी गोले में बांधकर 
सभ्य हाथों द्वारा 
फेंक दिया जाता होगा 

अनंत जन प्रवाह के बीच 
अपनी इच्छा के विरुद्ध धधकने के लिए 
हंसती-गाती ज़िंदगियों को निगलने के लिए 
तिड़-तिड़, धड़-धड़, धड़ाम-धड़ाम
वह चबाती चली जाती होगी 
घास-फूस, लकड़ियां, पत्थर 
बच्चे- जवान, बूढ़े 
हंसी, खुशी, सपने, भविष्य 

सब कुछ चबा चुकने के बाद 
ख़ामोश होकर 
सुबक-सुबक कर रोती होगी 
उसने यह क्या किया ?
लेकिन उसने कहां किया 
उसका अपने पर वश कहां है 
वह तो केवल ताप है 
जहां रखी जाएगी, जलाएगी

उसे तो प्रतीक्षा रहती है
गृहिणी के हाथों की 
कारीगर के हाथों की 
वसंत के हाथों की 
बच्चों के हाथों की 

~रामदरस मिश्र 
7 वर्ष पहले
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