पेशानी पे शम्स आंखों में तारों की ज़िया थी
वह कैसे बुझा जिसको ज़माने की दुआ थी
हाजी था नमाज़ी था बड़ा नेक था बंदा
क्या इसके अलावा भी उसकी कोई ख़ता थी
नग़मे तो तेरे फिर भी सुने जायेंगे लेकिन
कुछ तेरी ज़रूरत हमें इसके सिवा भी थी
अल्लाह वह रोज़ा था कि रोज़े-क़यामत
अफ़तारी का था वक़्त मगर सर पे क़ज़ा थी
नाख़ुश था ख़ुदा अपने फ़रिश्तों से वगरना
धरती के फ़रिश्ते की ज़रूरत उसे क्या थी
साभार: पयंबर-ए-मौसीक़ी, मोहम्मद रफ़ी, चौधरी ज़िया इमाम, (थाम्सन प्रेस) इंडिया