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दीप्ति नवल की कविता ‘अजनबी रास्तों पर पैदल चलें कुछ न कहें’

दीपाली अग्रवाल

Irshaad
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अजनबी रास्तों पर


पैदल चलें
कुछ न कहें

अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ न कहें
चलो दूर तक

तुम अपने माजी का
कोई ज़िक्र न छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म न दोहराऊँ
तुम कौन हो
मैं क्या हूँ
इन सब बातों को
बस, रहने दें

चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।


साभार- कविताकोश 
7 वर्ष पहले
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