करो न शोर परिन्दा है डर न जाए कहीं ।
ज़रा-सा जीव है हाथों में मर न जाए कहीं ।
अगर गुलाब की चाहत है तोड़ ले बढ़ कर,
कहो हयात से काँटों से डर न जाए कहीं ।
वो फिर चुनाव में वादों के साथ उतरा है,
उसे कहो कि वो फिर से मुकर न जाए कहीं ।
मुझे तो सुर्ख़ सवेरों की तरफ़ जाना है,
मेरी हयात अँधेरों से डर न जाए कहीं ।
लगी है आग नगर में औ’बुझ भी जाएगी,
ज़रा हवा से यह कह दो उधर न जाए कहीं ।