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भूख लगी है चलो, कहीं कुछ खाएं...

काव्य डेस्क

Irshaad Hasya
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                            भूख लगी है
        
                                                    
                            
चलो, कहीं कुछ खाएं ।

देखता रहा उसको
खाते हुए लगती है कैसी,

देखती रही मुझको
खाते हुए लगता हूं कैसा ।

नख़रेदार पानी पिया
नख़रेदार सिगरेट
ढाई घंटे बैठ वहां
बाहर निकल आए ।


(अशोक चक्रधर की हास्य कविता)

साभार- कविता कोश
9 वर्ष पहले
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