- हिंदी में कश्मीर पर एक मुकम्मल किताब है ‘कश्मीर और कश्मीरी पंडित’
- कश्मीर एक प्रयोगशाला है और हर राजनीतिक पार्टी इसका इस्तेमाल अपने पक्ष के लिए करते हैं। - कश्मीरी पंडित कुमार वांचु
- दिल्ली पुस्तक मेला में महुआ माजी ने किया अपने नए उपन्यास से अंश पाठ
- राम मिलन की किताब रमुआ-कलुआ-बुधिया और राष्ट्रवाद पुस्तक का लोकार्पण
विश्व पुस्तक मेले में पाठक कश्मीर और कश्मीरी पंडित किताब का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मेले के छठे दिन राजकमल प्रकाशन के ‘जलसाघर’ के मंच से अशोक कुमार पंडित के उपन्यास का लोकार्पण किया गया। इस मौके पर कश्मीरी पंडित वांचु परिवार भी उपस्थित रहे। उपन्यास में अशोक कुमार पांडेय ने कश्मीर के 1500 साल के कश्मीर के इतिहास और कश्मीरी पंडितों के पलायन को समेटा है। पुस्तक के बारे में लेखक से पत्रकार प्रकाश के रे ने बातचीत कर कहा कश्मीर के मौजूदा हालात और इसके इतिहास पर कई सवाल किए।
सवालों का जवाब देते हुए अशोक कुमार ने कहा कि, “किताब के रिसर्च के लिए मैं 5 अगस्त के बाद कश्मीर गया और कई कश्मीरियों से बातचीत की। धारा 370 के हटने का असर हम बर्फ़ पिघलने के बाद ही समझ पाएंगे। मार्च के बाद हमें पता चलेगा कि धारा 370 के हटने का क्या असर हुआ है।“
कश्मीर का इतिहास, समाज, राजनीति और उसकी समस्याओं को इस किताब में विस्तार से बताया है। हिंदी में कश्मीर पर एक मुकम्मल किताब है ‘कश्मीर और कश्मीरी पंडित’। किताब में कश्मीर का 1500 वर्षों का इतिहास है और कश्मीरी पंडितों के पलायन की प्रमाणिक दास्तान है।
बातचीत में पत्रकार प्रकाश के रे ने कहा, “कश्मीर के बारे में पहले सिर्फ घटनाओं पर भी बात होती है। उसमें तथ्य, विमर्श और विश्लेषण बहुत कम होता था। कश्मीर और कश्मीरी पंडित किताब के आने के बाद ये कमी पूरी हो गई।“
इस मौके पर ख़ास कश्मीर से आए कुमार वांचु और उनके परिवार ने अपनी बात रखते हुए कहा, “कश्मीर उतना नहीं है जो हम खबरों में देखते हैं। कश्मीर पंडित के दो पक्ष चलते रहते हैं। एक में उनको हीरो बना दिया जाता है और दूसरे में बस बहस होती है।“
राजकमल प्रकाशन के जलसाघर में पाठकों के बीच लेखिका महुआ माजी ने अपने शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास से एक छोटा सा हिस्सा पढ़ कर सुनाया।
लेखक से मिलिए कार्यक्रम में लेखक-आलोचक प्रभात रंजन और मृत्युंजय के उपन्यास के नाम को लेकर किए गए सवाल का जवाब देते हुए महुआ ने कहा, “उपन्यास के नाम को लेकर अक्सर मुझसे सवाल पूछे जाता है, लेकिन मैं बहुत पर्फेक्शनिस्ट हूँ। जब तक उपन्यास पूरा न हो जाए नाम तय कर पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल होता है।“
राम मिलन की किताब रमुआ-कलुआ-बुधिया और राष्ट्रवाद पुस्तक का लोकार्पण।
राष्ट्रवाद के बारे में लेखक ने बताया, राष्ट्रवाद की सबसे पहली इकाई मनुष्य है। मैंने इस किताब में जातिवाद, धार्मिक, लैंगिक राष्ट्रवाद के बारे में विस्तार से बताने की कोशिश की है। लेखक ने ये भी कहा, हो सकता है इस पर कुछ लोग सहमत हों और कुछ लोग असहमत हों।
6 वर्ष पहले