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गर्मी के मौसम पर सुधा गुप्ता की हाइकु कविता:  तन्दूर तपा धरती रोटी सिंकी

रत्नेश मिश्र

Haiku
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तन्दूर तपा
धरती रोटी सिंकी
दहके लाल

2
आग का गोला
फट गया सुबह
बिखरे शोले

3
सूखे गले से
कलप रही हवा
घूँट पानी के

4
लपटों -घिरा
अगिया बैताल-सा
लू का थपेड़ा
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5
आग की गुफ़ा
भटक गई हवा
जली निकली

6
फटा पड़ा है
हज़ार टुकड़ों में 
पोखर-दिला

 7
धूप से तपा
देह पर फफोले
ले, दिन फिरा

8
कुपिता धरा
अगन-महल में
आसन-पाटी

9
धूप दरोगा 
गश्त पर निकला
आग-बबूला

10
जेठ की आँच 
हवाएँ खौलती हैं
औटते जीव

11
पानी की धुन
सूखे गले भटके 
राजा मछेरा*

12
धधक रही
लाल पीली कनेर
सड़कों पर

13
फूलों से लदा
बूला होशो-हवास
अमलतास

14
हत शोभा श्री
निर्जला उपासी
जेठ की धरा

15
उबल रहे 
ब्रह्माण्ड के देग में
चर-अचर

16
वन-अरण्य
जलें रूई मानिन्द
लपटें, धुँआ

17
आया है द्वार
धूल-भरी झोली ले
जोगी बैसाख

18
अंगारे बिछा 
सोने चली धरती
लपटें ओढ़

19
नीम-बेहोश
करवट से लेटी
है दोपहरी

20
तक़्न है रूखा
होंठों जमीं पपड़ी
वैशाखी धरा

21
प्यासी चिड़िया
ख़ुश, टोंटी में छिपा
दो बूँद पानी

22
कुँए, छबील
प्यास बूझने वाले 
मीत लापता 

23
सती का शव
काँधे डाले घूमते
बौराए रुद्र

24
गुलमोहर
खिला, आग रंग की
धूप -छतरी 
7 वर्ष पहले
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