जब भी रोया
विकल मन मेरा
तुमको पाया।
निर्मल बहे
पहाड़ी झरने -सा
प्रेम तुम्हारा।
नेह तुम्हारा
सर्दी की धूप जैसा
उँगली फेरे।
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गूँज रही है
मन-नीरव घाटी
प्रेम-बाँसुरी।
प्रेम-अगन
अनोखे आलिंगन
बर्फीली सर्दी।
मुझे बुलाए
मूक स्वीकृति-जैसी
तेरी मुस्कान ।
लजाई धूप
पलकें ना उठाए
नव वधू -सी
अमृत–बूँदें
प्रिय प्रेम तुम्हारा
चाय -चुस्की -सा
गर्म लिहाफ़
आँखों में निरन्तर
स्वप्न -शृंखला
कोहरा ढके
अठखेलियाँ सारी
प्रिय -संग की ।
पूष की रातें
पिया तू सीमा पर
सिहरें तन ।