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कविता भट्ट : प्रेम-अगन, अनोखे आलिंगन

रत्नेश मिश्र

Haiku
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जब भी रोया
विकल मन मेरा
तुमको पाया।

निर्मल बहे
पहाड़ी झरने -सा
प्रेम तुम्हारा।

नेह तुम्हारा
सर्दी की धूप जैसा
उँगली फेरे।
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गूँज रही है
मन-नीरव घाटी
प्रेम-बाँसुरी।

प्रेम-अगन
अनोखे आलिंगन
बर्फीली सर्दी।

मुझे बुलाए
मूक स्वीकृति-जैसी
तेरी मुस्कान ।

लजाई धूप
पलकें ना उठाए
नव वधू -सी

अमृत–बूँदें
प्रिय प्रेम तुम्हारा
चाय -चुस्की -सा

गर्म लिहाफ़
आँखों में निरन्तर
स्वप्न -शृंखला

कोहरा ढके 
अठखेलियाँ सारी
प्रिय -संग की ।

पूष की रातें
पिया तू सीमा पर 
सिहरें तन ।
7 वर्ष पहले
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