सूरज डूबा
चांद आया नभ में
चांदनी फैली।
तारे नभ में
टिमटिमाने लगे
आसमां तले।
चांद जला है
पूरी रात चाँदनी
फैलाते हुए।
जागा चकोर
उम्मीद में पाने को
चांद का साथ।
रवि निकला
भोर होने को आया
चिड़ियाँ बोलीं।
मुर्गे की बाँग
सबके कानों में भी
गूंजने लगी।
सुबह होते
चांदी सी शबनम
छलक गयीं।
अब बछड़े
कुलांचे मार-मार
दौड़ने लगे।
किसान जागा
अब बैलों को चारा
खिलानें लगा।
कंधे पे रख
हल किसान चला
अपने खेत।
सूरज चढ़ा
दोपहर हो गई
गरमी फैली।
सब व्याकुल
खोजें शीतल छांव
बगीचे तले।
शाम हो गई
गोधुली बेला आयी
लालिमाँ छाई।
सूरज डूबा
चांद तारे चमके
दीपक जले।
रात पसरी
सो गया सारा गांव
चांदनी तले।
दिनेश यादव
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