कुछ वर्ष पहले युवा पत्रकार मोनिषा राजेश की एक रोचक किताब आई थी अराउंड द इंडिया इन 80 ट्रेन्स। यह ट्रेन के सफर के जरिये भारत के बहुविध समाज को समझने की एक कोशिश थी। भारत को जानने-समझने का एक तरीका यहां होने वाले चुनाव भी हैं। सात दशक के लोकतांत्रिक सफर में भारत में लोकसभा के 16 और विधानसभाओं के हजारों चुनाव हो चुके हैं, लेकिन भारतीय जनमानस के मिजाज को पकड़ पाना आसान नहीं होता। ग्लोबल इन्वेस्टर और लेखक रुचिर शर्मा पिछले पच्चीस साल से लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर हवा का रुख भांपने की कोशिश करते रहे हैं। खास बात यह है कि इसके लिए वह वरिष्ठ पत्रकारों, राजनीतिक और चुनाव विशेषज्ञों की टीम भी साथ लेकर चलते हैं। उनकी यह ताजा किताब इन यात्राओं के अनुभव और उनके तथा उनकी टीम के आकलन पर आधारित है। इन चुनावी यात्राओं के इस अनुभव के बाद रुचिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि भारत में अब संस्थाओं और नीतियों पर राज्य का नियंत्रण है, लिहाजा उद्यमी और व्यावसायी सरकार के खिलाफ नहीं बोलता। यह अमेरिका के उलट है।
इस क्रम में एक रोचक चीज यह भी है कि एंटी इनकंबेंसी यानी सत्ता विरोध उनके मुताबिक एक भारतीय अवधारणा है। लिहाजा सत्तारूढ़ दल और उसका नेता चाहे वह कोई भी हो, उसे इसका सामना करना पड़ता है। उन्होंने अपनी यात्रा की शुरुआत मई, 1996 में हुए लोकसभा चुनाव से की थी। यह 1991 में आर्थिक सुधार लाने वाली पी. वी. नरसिंह राव सरकार के पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद हुए थे। उस दौरान न्यूयॉर्क से आए कुछ भारतीयों का मत था कि आर्थिक सुधारों के कारण नरसिंह राव को दूसरा कार्यकाल मिल जाएगा। मगर वे गलत साबित हुए। रुचिर ने आर्थिक सुधार, प्रौद्योगिकी और विकास जैसे मुद्दों पर चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी जैसे मुख्यमंत्रियों की शिनाख्त की है, लेकिन जरूरी नहीं कि मतदाता तक ये मुद्दे उसी रूप में पहुंचते हैं।
इस सिलसिले में 2004 के वाजपेयी की अगुवाई वाले एनडीए के इंडिया शाइनिंग वाले चुनाव का जिक्र किया जा सकता है, जिसमें उसे हार का सामना करना पड़ा था। आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर रुचिर का आकलन है कि यह चुनाव नरेंद्र मोदी और अन्य के बीच है और यह चुनाव काफी हद तक राज्यों में लड़े जाने वाले चुनावों की शृंखला जैसा होगा। नतीजा बहुत कुछ इस पर निर्भर होगा कि विपक्षी दल उनके खिलाफ कितना एकजुट हो पाते हैं। ऐसे में बेतिया से लेकर बिजनौर तक कई बार ठेठ ग्रामीण मतदाता की नब्ज टटोलने में चूक हो जाना स्वाभाविक है। अलबत्ता 2007 के गुजरात चुनाव के दौरान ही यह लगने लग गया था कि मोदी गांधीनगर से दिल्ली का रुख कर सकते हैं। इस यात्रा के दौरान रुचिर की टीम के कुछ प्रश्नों से मोदी नाराज भी हो गए और तय डिनर छोड़कर भी चले गए थे। किताब में ऐसे बहुत से रोचक वाकये हैं।
किताब- डेमोक्रेसी ऑन द रोड
लेखक- रुचिर शर्मा
प्रकाशक- पेंग्विन रेंडम हाउस, नई दिल्ली
मूल्य- 699 रुपये