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समीक्षा: बांँसुरी से गीत मेरे

Surya kant

Book Review
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                                                    वंशी या बाँसुरी,संगीत में मानवीय भावनाओं को घनीभूत कर उन्हें जग में स्थापित करने में अद्वितीय है,फिर वह चाहे उस साँवरे की वंशी हो या फिर किसी गीतकार की रचनाओं को बांँसुरी की तानों के समकक्ष लाने के प्रयास ! सीधी सी बात है माधुर्य तो होगा ही!! यही अदृश्य सी महक समीक्ष्य पुस्तक को पढ़ने में महसूस होती है।

यह बात भी सत्य है कि गीत कविता,छंद,सब संवेदनशील,सरल शीलोवांछित वृत्ति मानव- मन का राग है।गीत,मस्ती और सुख के क्षणों को ही नहीं परिभाषित करते वरन नौ के नौ रसों को प्रतिबिंबित और प्रतिपादित करते हैं,यही अनुभूति इस गीत-संग्रह को पढ़ने से पाठक को मिलेगी। वरिष्ठ गीतकार कुँअर बेचैन की के उद्गार यथा 'पाठकों के हृदय-कपाट खोलते हुए गीत'  में मुझे अपना कथन भी प्रतिबिंबित प्रतीत होता है। कुल सौ गीतों का गुलदस्ता  जीवन के ऊँचे-नीचे रास्तों, खट्टे-मीठे,कड़वे-कसैले,तिक्त रसों के सोपान पर से तैरता हुआ पाठकों को इसी दुनिया के नए रूप यथा-सकारात्मकता,सृजनात्मकताआशावादिता,पुरुषार्थ और कर्म की प्रधानता से रू-ब-रू कराते हैं।
   कवि और गीतकार से यह अपेक्षा रहती है कि सत्य की निर्ममता को सुंदरता,आशा और विश्वास के पात्र में पेश करे और यह अपेक्षा किशोर कुमार कौशल ने पूरी जिम्मेदारी से पूरी की है,एक बानगी -

नया प्रकाशपुंज है प्रफुल्ल कुंज कुंज में।
सुरीले पंछियों को कौन टेरता  निकुंज में।।

शीर्षक गीत 'बांँसुरी से गीत मेरे' बेहद संवेदनशीलता,अनुभव और मीठी तान पर लिखा गया है,यथा

बांँसुरी से गीत मेरे,तनिक होठों पर धरो तो,
है नहीं मधुमास मेरे गीत में पतझार भी है,
है नहीं संयोग केवल,विरह का अंँधियार भी है,
पर्वतों के साथ गाती तनिक निर्झर सी झरो तो।'

  गीतों का संसार आजकल यांत्रिकता में कहीं खो सा गया लगता है और इस प्रकार के गीत-संग्रह जीवन की आपा-धापी,भौतिकता की चौंध से निकाल कर मानव का उसके प्रारब्ध यानि माँ और उसकी ममता के पास ला खड़ा करते हैं। 

 मन को बेहद छूने वाली नज़ीर-
हर अमावस पूर्णमासी याद रहती थी
तुम बनाती खीर फिर कुछ बात कहती थी
  मन्नतें कुल-देवता की साथ रहती थी,
मांँ मुझे अक्सर तुम्हारी याद आती है।

एक और पहलू जो इस गीत- संग्रह को अन्य से अलग खड़ा करता है वह है-लोकगीत और लोरी!!! ये दोनों भारतीय भूभाग, गिरमिटिया भारतीयों के संस्कार और संस्कृति का नव-रस अंग है. यथा-

 महकता चंदन मेरा देश,आयौ होरी कौ त्यौहार,बादल राग,पनिहारिन और यहांँ लोकभाषा का प्रयोग हमारी लोक-संस्कृति को जीवंत करता है।
प्रकृति और पर्यावरण पर भी कुशल रचनाकार की लेखनी बड़ी ही तन्मयता से चली है।
 
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एक और बात कि अब जब  हमारा देश कोरोना-दंश से  मुक्त होने की तरफ बढ़ रहा है,तब मन को सांत्वना और सहारा देने और पुनः कर्म-पथ पर बढ़ाने को गीत और कविता से बेहतर अंदाज़ हो ही नहीं सकता 'इन संदर्भों में यह गीत-संग्रह सहायक साबित होगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह बात भी स्पष्ट और खरी है कि बड़ा नाम और बड़े प्रकाशक का बैनर,बरगद की सी भूमिका निभा रहे हैं और मीडिया भी अनजाने में बरगद पर बैठा दिखाई पड़ता है। ऐसे में रचनाधर्मिता और रचनाकार भी प्रभावित होते हैं। तब सरकारी और निजी प्रकाशकों को अच्छे परंतु अनजान सर्जकों को अलग से संँजो कर आम सरीखे पेड़ों की भाँति रोपना चाहिए ताकि समाज का दर्पण साहित्य सही छवि प्रस्तुत कर सके। कुल मिला कर सहज ,सरस,संवेदनशील, लालित्य-पूर्ण गीत-संग्रह सभी वर्ग के पाठकों को लुभाएगा।
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