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रजनीकांत से जानिए, बस कंडक्टर से कैसे बने साउथ के सुपरस्टार

zindagi ki diary se a book review
                
                                                         
                            मेरा जन्म बेंगलुरू के एक मराठी परिवार में हुआ। पिताजी के रिटायर होने के बाद हम बेंगलुरू में अपने पैतृक स्थान चले गए। मैं घर में सबसे छोटा था और सबसे शरारती भी। मैं पढ़ाई में भी अच्छा था और खेल या अन्य गतिविधियों में हमेशा आगे रहता था। मां की मृत्यु के बाद बड़े भाई ने मुझे रामकृष्ण मठ भेज दिया, जहां मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। उस दौरान मैं वेदों, कला और साहित्य को पढ़ने और समझने लगा, जिससे मेरे अंदर कला और साहित्य के प्रति लगाव बढ़ा। तभी मैं धीरे-धीरे थियेटर और स्टेज को समझने लगा। मैं नाटकों में हिस्सा लेता और मुझे एक्टिंग करते हुए बहुत सुकून मिलता था। एक बार स्कूल में महाभारत नाटक का मंचन हुआ, जिसमें मैं एकलव्य का दोस्त बना था। नाटक देखने प्रसिद्ध कवि डी. आर. बेंद्रे भी आए थे। नाटक देखने के बाद वह मुझसे मिले और उन्होंने बताया कि उन्हें मेरे द्वारा निभाया गया किरदार बहुत पसंद आया। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई। इससे मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।
                                                                
                
                
                 
                                    
                     
                                             
                                                

उसके बाद ही मुझे कंडक्टर का लाइसेंस मिलता...

पढ़ाई पूरी होते-होते मैं यह ठान बैठा था कि मुझे एक्टिंग ही करनी है, लेकिन घर के हालात सही नहीं थे। पिता के रिटायरमेंट के बाद बड़े भाइयों के ऊपर जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं, इसलिए मैंने भी छोटी-मोटी नौकरियां तलाशना शुरू किया। मैंने कुली का काम भी किया। कार्यालयों में फाइलें भी उठाईं। कुछ दिन कारपेंटर का काम भी किया। कभी काम होता, कभी नहीं होता। मेरे बड़े भाई सत्यनारायण ने हमारे एक रिश्तेदार से मुझे बेंगलुरू के बस ट्रांसपोर्ट सर्विस में कंडक्टर की नौकरी लगवाने की बात कही।

बीटीएस में नौकरी करना आसान नहीं था। मुझे एक टेस्ट देना था, उसके बाद ही मुझे कंडक्टर का लाइसेंस मिलता। खैर, टेस्ट में पास होने के बाद मुझे नौकरी मिल गई। घरवाले भी खुश थे, क्योंकि मुझे सरकारी नौकरी मिल गई थी। पिताजी भी यही चाहते थे कि मैं अच्छी नौकरी पाकर शादी कर लूं, लेकिन मेरे ख्वाब कुछ और थे। बस कंडक्टर की नौकरी करने के दौरान मेरी दोस्ती राजा बहादुर से हो गई, जो ड्राइवर थे। सच कहूं, तो मेरे सपने को साकार करने में बहुत ही कम और खास लोगों का योगदान रहा, जिनमें राजा और मेरे बड़े भाई सत्यनारायण शामिल हैं।
 
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उसके बाद ही मुझे कंडक्टर का लाइसेंस मिलता...

8 वर्ष पहले

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