Urdu Poetry: बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ
- राहत इंदौरी 

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यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
- शकील बदायूंनी 

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दफ़्तर से मिल नहीं रही छुट्टी वगर्ना मैं
बारिश की एक बूँद न बे-कार जाने दूँ
- अज़हर फ़राग़

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दर-ओ-दीवार पे शक्लें सी बनाने आई
फिर ये बारिश मिरी तन्हाई चुराने आई
- कैफ़ भोपाली

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मैं उस के वादे का अब भी यक़ीन करता हूँ
हज़ार बार जिसे आज़मा लिया मैं ने
- मख़मूर सईदी

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ज़माने पर भरोसा करने वालो
भरोसे का ज़माना जा रहा है
- नईम अख़्तर ख़ादिमी

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Urdu Poetry: पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है

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