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'मेरे मसखरेपन से दोस्तों की ऊबी हुई बीवियों का मनोरंजन होता था'

रवीन्द्र कालिया
                
                                                         
                            
मशहूर उपन्यासकार और कहानीकार रवीन्द्र कालिया वैसे तो काफ़ी ख़ुशमिज़ाज थे। वह जिस महफ़िल में होते वहां माहौल ख़ुशगवार होता था। लेकिन एक बार उन्हें इसका ख़ामियाज़ भी भुगतना पड़ा था। ज्ञानपीठ से प्रकाशित संस्मरण 'ग़ालिब छुटी शराब' में रवीन्द्र कालिया लिखते हैं, 'जब से मैंने शराब से तौबा की है, मेरी कई समस्याओं का सहज ही समाधान हो गया है। अपनी प्रत्येक ख़ामी, कमज़ोरी और असफलता को मसगुसारी के खाते में डालकर मुक्त हो जाता हूं। वास्तव में दो-चार पेग के बाद मेरे भीतर का 'क्लाउन' काफ़ी सक्रिय हो जाता था। मेरे बोलौस मसखरेपन से दोस्तों की ऊबी हुई बीवीयों का बहुत मनोरंजन होता था। यह दूसरी बात है कि इसकी मेरे दोस्तों को ही नहीं, मुझे भी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है।' 

वो लिखते हैं, 'अब तो ख़ैर मेरे हमप्याला दोस्तों ने अघोषित रूप से मेरा सामाजिक बहिष्कार कर रखा है। भूले-भटके मगर कोई मित्र मुझे महफ़िल में आमंत्रित करने की भूल कर बैठता है तो जल्दी  ही उसे अपनी ग़लती का एहसास हो जाता है, जब उसकी पत्नी भरी महफ़िल में उसे ज़लील करने लगती है कि कालिया जी शराब छोड़ सकते हैं तो आप क्यों नहीं छोड़ सकते! यही कारण है कि मैं ऐसी पार्टियों से अकसर कन्नी काट जाता हूं और संस्मरणात्मक लेखन से अपना और आपका समय नष्ट करने को अपनी सेहत के लिए ज़्यादा मुफ़ीद समझता हूं। वर्ना शराब ने मुझे क्या-क्या नज़ारे नहीं दिखाए !'

रवीन्द्र कालिया के दोस्त को किसी काम के सिलसिले में दिल्ली जाना था पर उनके दोस्त ने उन्हें अपने घर पर रुकने की बजाए कहीं बाहर रहने के लिए कहा। कालिया लिखते हैं कि एक बार पूस की एक ठिठुरती रात तो भुलाये नहीं भूलती, जब लखनऊ में अचानक मेरे परम मित्र और मेज़बान ने मुझे आधी रात फ़ौरन से पेश्तर घर छोड़ देने के निर्मम सुझाव दे डाला था।  कुछ देर पहले हम लोग अच्छे दोस्तों की तरह मस्ती में दारू पी रहे थे।

मेरे मित्र ने नया-नया स्टीरियो ख़रीदा था और हम लोग बेग़म अख़्तर को सुन रहे थे : 'अरे मयगुसारों सवेरे-सवेरे. ख़राबाद के गिर्द घेरे पैर घेरे' कि अचानक टेलीफ़ोन की घंटी टनटनायी। फोन सुनते ही मेरे मित्र का नशा हिरन हो गया, वह बहुत असमंजस में कभी मेरी तरफ़ देखता और कभी अपनी बीवी की तरफ़। उसके विभाग के प्रमुख सचिव का फोन था कि उसे आधे घंटे के भीतर लखनऊ से दिल्ली रवाना होना है। उसने अपनी बीवी से सूटकेस तैयार करने के लिए कहा और कपड़े बदलने लगा। सूट-टाई से लौस होकर उसने अचानक अत्यन्त औपचारिक रूप से एक प्रश्न दाग दिया, 'मैं तो दिल्ली जा रहा हूं इसी वक़्त, तुम कहां जाओगे?'
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'वह मेरा बचपन का दोस्त था, हम लोग साथ-साथ बड़े हुए थे'

8 वर्ष पहले

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