मैं विज्ञान का छात्र था और साहित्य में मेरा दख़्ल नया नया था। दिल्ली यूनिवर्सिटी में बी ए इंग्लिश शुरू ही किया था। इंटरनेट का दौर नहीं था वो, सो लाइब्रेरी के अंधेरे कोनों में प्रेम कविताएं ढूंढ़ते ढूंढ़ते, अचानक एलियट की कविताओं की किताब दिखी। पहली कविता का नाम था 'जे अल्फ्रेड प्रुफ्रोक का प्रेम गीत'! इस आशा में कि कुछ तो मिलेगा जिसे कंठस्त कर कॉफ़ी पे यार दोस्तों को सुनाया जा सके।
प्रेम कविता नहीं मिली। मगर बीसवीं सदी के सबसे महान और आधुनिक काव्य के सबसे अग्रणी कवि से परिचय हो गया। और परिचय हुआ उस कविता से जिसने हमेशा के लिए कविता के स्वरुप को बदल दिया।
'जे अल्फ्रेड प्रुफ्रोक का प्रेम गीत' संभवतः पिछली सदी की सबसे प्रभावशाली कविता है, जिसकी छाया में हज़ारों नयी कविताएं और कवी जन्मे। मॉडर्निस्ट काव्य शैली का ये एक अनोखा और अग्रणी प्रदर्शन है जिसमें पहली बार इतनी बारीकी से आधुनिक नगर के मानस का चित्रण हुआ। इसके संगीत में नए स्वर थे, इसका मिज़ाज संजीदा भी था पर ये अपने पे हंसने से डरा नहीं। इसने पुराने पद्य और गीत शैलियों के साथ गद्य का लचीलापन जोड़ा, इसने पुराने मिथकों के ऊपर नए मिथक गड़े।
इस कविता ने एक नया रिश्ता जोड़ा...
इस कविता ने मेरा कविताओं से एक नया रिश्ता जोड़ा। एक आधुनिक रिश्ता।
मैंने नीचे दिए अनुवाद में टी इस एलियट की इस महान कविता का संगीत बरक़रार रखने की कोशिश की है - ताकि हिंदी का काव्य प्रेमी उसकी आत्मा की एक झलक पा सके।
जे अल्फ्रेड प्रुफ्रोक का प्रेम गीत
टी एस एलियट
अनुवाद - अर्विन्द जोशी
[अगर मैं जानता कि मेरा जवाब
एक ऐसे व्यक्ति के लिए है जो कभी तो लौटेगा दुनिया में,
ये आग ठहर जाती, आगे न बढ़ती।
पर चूंकि उस तलहटी से
कोई कभी ज़िंदा न लौटा, - अगर मैंने सच सुना है -
मैं तुम्हें जवाब देता हूं, बिना बदनामी के डर के। ]
तो फ़िर चलते हैं, तुम और मैं,
जब कि शाम आकाश पर फैली हो
जैसे कोई मरीज़ बेहोश मेज़ पर,
चलते हैं, किन्हीं आधी वीरान सी गलियों से होके,
बेचैन रातों के वो बुदबुदाते आशियाने
एक-रात सस्ते होटलों
और सीपों के खोल वाले बुरादों के रेस्टोरेंट में:
गलियां जो पीछा करती हैं किसी स्याह मक़सद के
उबाऊ बहस की तरह
जो तुम्हें लिए जाता है
विचलित करते एक सवाल तक
ओह, न पूछ, क्या है वो?
बस चलते हैं, और मिलते हैं।
कमरे में औरतें आ-जा रही हैं
माइकलएंजेलो की बातें करती।
वो पीली धुंध जो अपनी पीठ
खिड़कियों के शीशों पे रगड़ती है,
वो पीला धुआं जो अपना मुंह
खिड़कियों के शीशों पे रगड़ता है,
उसने शाम के कोनों को जीभ चाटा,
नालों में खड़े पानियों पे ठहरा,
अपनी पीठ पर वो स्याह कालिख गिरने दी जो गिरती है चिमिनियों से,
छत से फिसला, एक यकायक छलांग ली,
और ये देखते कि वो एक मुलायम अक्टूबरी रात थी,
घर के बगलों गोल हो के सो गया।
और यक़ीनन वक़्त होगा
उस पीले धुंए के लिए जो गलियों रेंगती है,
खिड़कियों के शीशों पे अपनी पीठ रगड़ती,
वक़्त होगा, वक़्त होगा,
एक चेहरा तैयार करने का, उन चेहरों से मिलने जिन चेहरों से मिलते हो तुम,
वक़्त होगा हत्या और सृजन के लिए,
और वक़्त उन सभी कामों के लिए, उन सभी हाथों के दिनों के लिए
जो एक सवाल उठाके रखते हैं तुम्हारी थाली में;
वक़्त तुम्हारे और वक़्त मेरे लिए,
और वक़्त फिर भी हज़ारों असमंजसों के लिए
और हज़ारों सपनों और संशोधनों के लिए,
एक टोस्ट और चाय से पहले।
कमरे में औरतें आ जा रही हैं
माइकलएंजेलो की बातें करती।
और यक़ीनन वक़्त होगा
ये सोचने के लिए कि - "हिम्मत कर सकता हूं ?" और कि "हिम्मत कर सकता हूं ?"
वक़्त वापस मुड़ के सीढ़ियां उतरने का,
अपना गंजापन सर के बालों के बीच लेकर -
(वो कहेंगे - 'उसके बाल कितने पतले होते जा रहे हैं !')
मेरा सुबह का कोट, मेरा कालर स्थिर और ठुड्डी तक चढ़ता,
मेरी टाई, मेहेंगी और शालीन, पर एक मामूली पिन से थमी -
(वो कहेंगे: लेकिन उसके हाथ-पांव कितने पतले हैं !)
हिम्मत कर सकता हूं
ब्रह्माण्ड को हिलाने की ?
एक पल में वक़्त होता है
निर्णयों और संशोधनों के लिए जिसे एक पल बदल देगा।
क्यूंकि मैंने उन सब को पहले ही से जाना है, सब को जाना है:
जानी हैं सभी शामें, सभी सुबह, और दोपहर जाने हैं,
मैंने अपना जीवन कॉफ़ी के चम्मचों में माप डाला है;
मैं जानता हूं उन बुझती आवाज़ों को जो बुझती हुई गिर रही हैं
दूर कमरे के संगीत की आवाज़ के नीचे।
तो मैं कैसे हिम्मत करूं ?
और मैंने पहले ही से वो आंखें जान ली हैं, सबको जाना है -
वो आंखें जो तुम्हें एक तैयार उक्ति में कील देती हैं,
और जब मैं तैयार हूं, एक पिन पे रुका फैला,
जब मैं दीवार पे ठुका हुआ कलबला रहा हूं,
तब मैं कैसे शुरू करूं
अपने दिनों अपने तरीकों के ठूंठे थूकना ?
और मैं कैसे हिम्मत करूं ?
और मैंने पहले ही से वो बाहें जान ली हैं, सब जाना है -
बाहें, कंगनी और गोरी और नग्न
(पर चिराग की रोशनी में, और हल्के-भूरे बालों से ढकी)
क्या कपड़ों से आती खुशबू है
जो यूं मेरा ध्यान बंटा रही है ?
बाहें जो मेज के बराबर पड़ी होती हैं, या फ़िर पश्मीने से लिपटी।
और मैं क्या हिम्मत करूं ?
और मैं शुरू कैसे करूं ?
क्या मैं ये कहूं, कि मैं सांझ ढले संकरी गलियों से गुज़रा हूं
और मैंने देखा है धुआं उठता, अकेले आदमियों के पाइपों से,
कमीज़ की बाज़ुओं में खड़े, खिड़कियों से बाहर झांकते।
मुझे होना चाहिए था खुरदरे पंजों का जोड़ा
पार सटकते बेआवाज़ समुद्र के तले।
और दोपहर, शाम, कितने शान्त सो रहे !
लम्बी अंगुलियों से दुलारे,
उनींदे ... थके ... या फ़िर स्वांग करता,
ज़मीं पे लम्बा, यहां, करीब तुम्हारे और मेरे।
क्या मुझमें, चाय और केक और आइस लॉली के बाद,
शक्ति होनी चाहिए कि मैं इस क्षण को जबरन चरम पे ले जाऊं ?
अलबत्ता मैं रोया और मैंने व्रत रखे, रोया और पूजा की,
अलबत्ता मैंने अपना सर (अब कुछ गंजा ) परात पे लाया देखा है,
मैं कोई पैगम्बर नहीं - और ये कोई बड़ा मसला नहीं;
मैंने अपनी महानता का क्षण फड़फड़ाता देखा है,
और मैंने देखा है उस अनादि नौकर (मृत्यु)को मेरा कोट पकड़ते, और मुझ पे हंसते,
और संक्षेप में, मैं डरा हुआ था।
और क्या वो किसी लायक होता, सब के बाद,
बाद कपों के, मार्मलेड के, चाय के,
पोर्सिलेन के गिर्द, तुम्हारी-मेरी कुछ बातों के गिर्द,
क्या वो किसी लायक होता,
कि मसले का एक ग्रास मुस्कराते खाया गया होता,
कि ब्रह्माण्ड को निचोड़ दिया गया होता गेंद में
और लुढ़काया गया होता किसी भारी प्रश्न की ओर,
कि कहा गया होता: "मैं लज़ारूस हूं, मृत लोगों में से चल के आया हूं,
वापस लौटा हूं तुमको सब कहने, मैं तुमको सब कहुंगा" -
अगर कोई, अपने सर तकिया करते
ये कहे: "ये मेरा मतलब बिल्कुल न था;
ये वह नहीं, बिल्कुल भी"
और क्या वो इस लायक होता, सब के बाद,
क्या वो किसी लायक होता,
बाद सुर्यास्तों के और आंगनों के और बाद छिडकी गलियों के,
बाद उपन्यासों के, बाद चाय के कपों के, बाद उन स्कर्टों के जो ज़मीं पे पीछे रगड़ती आती हैं -
और ये, और बहुत कुछ और भी ? -
मेरा मतलब है जो, वो कहना नामुमकिन है !
पर जैसे कोई जले लालटेन ने तंत्रिकाओं को स्क्रीन पे स्वरूपों में बिखेर दिया:
क्या वो किसी लायक होता
अगर कोई, तकिया बिठाते या शॉल फेंकते,
और खिड़की की ओर मुड़ते, कहे:
"ये वह बिल्कुल नहीं,
ये मेरा मतलब बिल्कुल नहीं। "
नहीं ! मैं राजकुमार हैमलेट नहीं, न मैंने होना था;
मैं एक सहायक नायक, ऐसा जो बस
प्रगति का ज्वार बढ़ाये, एक या दो दृश्य शुरू करे,
राजकुमार को मश्वरा दे; बेशक़, एक आसान उपकरण,
विनम्र, खुश कि काम आता हूं,
नीति-कुशल, सजग, और बेहद सतर्क;
अलंकृत भाषा से भरपूर, मगर ज़रा क्लिष्ट;
कभी, यक़ीनन, लगभग हास्यास्पद -
लगभग, कभी, बेवकूफ।
मैं बुढ़ा रहा हूं ... मैं बुढ़ा रहा हूं ...
मैं अपनी पतलून के पैरों को ऊपर मोड़ के पहनूंगा।
क्या मैं अपनी मांग पीछे निकालूं ? क्या मैं आड़ू खाने की हिम्मत करूं ?
मैं सफ़ेद फलनैल की पतलून पहनूंगा, और चलूंगा समुद्र तट पर।
मैंने जलपरियों को गाते देखा है : एक से एक।
मैंने उन्हें देखा है लहरों की सवारी करते समुद्र की ओर
लहरों के उड़ते बालों के पीछे कंघियां करते
जब हवा पानी को उड़ाता, सफ़ेद स्याह।
हम समंदर की कोठरियों में ठहरे हैं
समुद्री-युवतियों के गिर्द, जो लाल-भूरे खरपतवारों का सेहरा पहनी हैं
जब तक इंसानी आवाज़ें हमें जगाती नहीं, और हम डूबते नहीं।
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इस कविता ने एक नया रिश्ता जोड़ा...
8 वर्ष पहले
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