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Nazim Hikmet: तुर्की कवि नाज़िम हिक़मत की कविता 'खड़ा हूँ मैं राह दिखाती हुई रोशनी में'

nazim hikmet poetry in hindi darasal yah kuch iss tarah se hai
                
                                                         
                            

दरअसल, यह कुछ इस तरह से है

खड़ा हूँ मैं राह दिखाती हुई रौशनी में,
भूखे हैं मेरे हाथ, खूबसूरत है दुनिया.

बाग का बड़ा हिस्सा नही पातीं मेरी आँखें
कितने आशापूर्ण हैं वे, कितने हरे-भरे .

एक चमकीली सड़क गुजर रही है शहतूत के पेड़ों से होकर
कैदखाने के अस्पताल की खिड़की पर खड़ा हूँ मैं.

दवाओं की गंध नहीं ले पा रहा मैं --
जरूर गुलनार के फूल खिल रहे होंगे कहीं आस-पास.

इस तरह से है यह :
गिरफ्तारी तो दीगर मसला है,
असल मुद्दा है हार न मानना।

अनुवाद : मनोज पटेल

2 वर्ष पहले

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