इसकी ताल-ए-रवानी से लज़्ज़त पायी उसने,
इसकी वादियों में शायरी से इज़्ज़त पायी उसने!
क़ातिल ए गारत के मंज़र में जो मेरठ छूट गया,
यादों का एक क़ाफ़िला गर्द के ढेर में डूब गया!
कैफ़, ताज़, क़ैसर उल ज़ाफ़री जैसे फ़नकार हुए,
इसी शहर में बशीर बद्र जैसे अज़ीम शाहकार हुए!
ताज उल मसाजिद से अज़ान की आमद आती है,
मालीपुरा से मोगरे की लटों की खुशामद आती है!
रक़ाबियों में उड़ेल कर चाय पीने का मज़ा कहाँ है,
राजू टी स्टाल पर नमकीन चाय की लज़्ज़त जहाँ है!
स्वेटर के फंदों में वो नरम हाथों का प्यार यूँ ही रच गया,
ज़ाफ़रानी गिलौरियों का स्वाद उसकी शायरी में बस गया!
ख़ाला, अम्मा, पड़ोसन, बच्चा, पतंग, चाँद, महबूबा सभी,
उसके कलाम में जैसे बसा हो आज का हिंदुस्तान सभी!
रहने को इस दहर में सदा कोई यूँ आता नहीं है,
जैसे तुम 'शाम' कर गए हो कोई यूँ जाता नहीं है!
जब जब बारिश की पहली बूँद इस फ़िज़ा को महकाएगी,
बस्ती ए भोपाल बशीर के शेर हसरत से यूँ ही सदा दुहराएगी!
-संजय कुमार
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