मेरी कविता को सहारे की
ज़रूरत है क्यूंकि
यह कुछ दिनों से
दंगों की दर्द विशाराद तस्वीरें देखकर स्तब्ध है
वो रोना चाहती है
चीखना चाहती है
पर आंसूओं के शहर में भीषण सूखा पड़ गया है
आवाज़ों की ज़मीन पर दरारें पड़ गई हैं
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