मेरी कविता को सहारे की
ज़रूरत है क्यूंकि
यह कुछ दिनों से
दंगों की दर्द विशाराद तस्वीरें देखकर स्तब्ध है
वो रोना चाहती है
चीखना चाहती है
पर आंसूओं के शहर में भीषण सूखा पड़ गया है
आवाज़ों की ज़मीन पर दरारें पड़ गई हैं
छटपटाहट की हालत में
गुस्से में कलम से काग़ज़ को चीर देती है
दु:खी ख़यालों को झकझोरती है
ख़यालों पर नमी है मौन की
लफ़्ज़ों पर फफूंद पड़ गए हैं
ज़बानें सूख चुकी हैं
शब्द बेहोश हो जाते हैं
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