घटते हुये क्षणों ने पूछा
तट के रेत कणों ने पूछा,
कब सागर से मिलना होगा
सरिता के चरणों ने पूछा,
यही प्रश्न पूछे नदिया से जल भी उछल उछल...
नदिया मुस्काकर यह बोली
कल कल कल कल कल।
दिन को चैन नहीं मिलता है न ही रात को नींद,
जाने कहाँ खींचती मुझको बस कल की उम्मीद,
उम्मीदों में छुपा हुआ है हर मुश्किल का हल ...
नदिया मुस्काकर यह बोली
कल कल कल कल कल।
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