घटते हुये क्षणों ने पूछा
तट के रेत कणों ने पूछा,
कब सागर से मिलना होगा
सरिता के चरणों ने पूछा,
यही प्रश्न पूछे नदिया से जल भी उछल उछल...
नदिया मुस्काकर यह बोली
कल कल कल कल कल।
दिन को चैन नहीं मिलता है न ही रात को नींद,
जाने कहाँ खींचती मुझको बस कल की उम्मीद,
उम्मीदों में छुपा हुआ है हर मुश्किल का हल ...
नदिया मुस्काकर यह बोली
कल कल कल कल कल।
तटबंधों के संबंधों में घोलूं रोज मिठास,
यही एक दिन पहुँचायेंगे मुझे लक्ष्य के पास,
बहुत जरूरी होता पथ में अपनों का संबल...
नदिया मुस्काकर यह बोली
कल कल कल कल कल।
कितने ही अवरोध खड़े हों या विपरीत बयार,
रुकना मैंने कभी न सीखा चलना ही स्वीकार ,
जाने कितनी प्यासें होगीं मेरे लिये विकल...
नदिया मुस्काकर यह बोली
कल कल कल कल कल।
साभार: ज्ञानप्रकाश आकुल की फेसबुक वाल से
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