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Urdu Poetry: बिमल सहगल की रचना 'जज़्बातों के पंख होते तो हैं मगर उसूलन यह हवा में नहीं उड़ते'

bimal saigal urdu poetry jazbaton ke pankh hote toh hain magar usoolan yah hawa mein
                
                                                         
                            


जज़्बातों के पंख होते तो हैं मगर उसूलन यह हवा में नहीं उड़ते
सच है, ख़ारदार ज़मीन से पनपे आसमानों के लिए नहीं मचलते

ख़्वाहिशों के उकसाने पर भी दिल से उठ जज़्बात सिर नहीं चढ़ते
अलबत्ता, मर के दफन हो ख़्वाहिशों के पंख बन कुदरती आ उगते

जज़्बातों और ख़्वाहिशों में बेशक होता है कोई रिश्ता खानदानी
चुनांचे, जज़्बातों के बवंडर में उड़ लेती हैं ख़्वाहिशें हो आसमानी

अफसोस, फ़ितरत-ए-ख़्वाहिश भी तो आखिर जमींदोज़ होना है
काश, लुभाते आफ़ाक़ भी मुश्ताक़ कदमों की हद के अंदर होते

माना कि फ़क़त अरमानों की चारदीवारी से कहीं घर नहीं बनते
ईंट-पत्थर, गारा सभी जमीनी लगते हैं इमारत को खड़ी करते

फिर भी मुस्तकबिल हरजाई का ही तसव्वुर कर हम दीवानों ने
बेघर ख़्वाहिशों को ख़्यालों की ख़्वाबगाह में आबाद कर लिया 

2 वर्ष पहले

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