कुछ ख़ास ही हुआ करती थी
उन बीते दिनों बच्चों की अपनी दुनिया -
शाम होते ही उमड़ आता था हुजूम
खुले में, धमाचौकड़ी मचाता
घूम-घूम कर गलियां नापता
डोरियों पे पतंगों की पींगें बढ़ाता,
पेंच लढ़ाता, उन्हें लूटते छतें फलांगता।
दूर मैदान या तंग गलियों में ही
पिट्ठू, लंगड़ी टांग, गिल्ली डंडा,
छुपन-छुपाई या क्रिकेट के विकेट गाड़
शाम ढलने तक हुल्लड़ मचाना
और घरवालों की पुकार पर ही
लौट के घर वापिस जाना।
बारिश की रिमझिम में
छतों पर चढ़ बेतहाशा भीगना
गलियों में निकल खुशी से नाचना
कागज़ की किश्तियाँ नाली में बहाना
टोली बना, चोरी से बागों में घुस जाना
आम, अमरूद और जामुन तोड़ लाना।
अफसोस, यह बन कर रह गया बस
एक गुजरा हुआ जमाना
कोई भूला-बिसरा अफसाना।
अब तो सोफे में धंसा, बिस्तर पे पसरा
टेक्नोलोजी की हथकड़ियों में
खुद ही हाथ गहरे फंसाए, आंखे गड़ाए
सोशल मीडिया की बेड़ियों में बंधा
प्रगति के नाम पर ही
पिछड़ता हुआ बचपन
जीने को मजबूर है बस अकेलापन
भुला कर वो मस्ती का आलम
वो नुक्कड़ में जमाई
दोस्तों की महफिल में पुरोई
फुर्सत के मोतियों को चुगना-
खेलकूद में रमे रहना,
यूं मौज-मस्ती भरा बचपन बिताना।
हाय, होड़ लगाते उम्र के पड़ाव से ही
बच्चों से छिन रही है बरबस
उनकी मासूमियत, उनका बचपन
वहीं, विडंबना के जाल में फंसे रह आज उनका
अपने अस्तित्व से ही आगे निकलने की
बेमानी आज़माइश को अपनाना।
और, वो पीढ़ियाँ जो खुशकिस्मती से
जी पायी भरपूर अपना बचपन
फिक्रमंद हैं जरूर उनके लिए
कि काश, नए खुलते आयाम के
किसी बंद दरवाजे से ही लौट आएं
एक बार फिर से
गलियों से गुमशुदा हुई
उनकी मासूम मौज-मस्ती,
वो बेफिक्री का आलम-
वो गुज़रा ज़माना।
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