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वसीम बरेलवी की ग़ज़ल: मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो

उर्दू अदब
                
                                                         
                            मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो 
                                                                 
                            
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो 

वो बे-ख़याल मुसाफ़िर में रास्ता यारो 
कहाँ था बस में मिरे उस को रोकना यारो 

मिरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी 
कि अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो 

तमाम शहर ही जिस की तलाश में गुम था 
मैं उस के घर का पता किस से पूछता यारो  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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