फैलता जाता है नफ़रत का धुआँ इश्क़ करो
बुझ न जाए कहीं ये शो'ला-ए-जाँ इश्क़ करो
इश्क़ बिन जीने के आदाब नहीं आते हैं
'मीर' साहब ने कहा है कि मियाँ इश्क़ करो
कज-अदाई न फ़क़ीरों को दिखाओ यारो
एक शब के लिए मेहमाँ हैं यहाँ इश्क़ करो
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