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शहरयार: नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता

shaharyar famous ghazal nazar jo koi bhi tujh sa haseen nahin aata
                
                                                         
                            


नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता
किसी को क्या मुझे ख़ुद भी यक़ीं नहीं आता

तिरा ख़याल भी तेरी तरह सितमगर है
जहाँ पे चाहिए आना वहीं नहीं आता

जो होने वाला है अब उस की फ़िक्र क्या कीजे
जो हो चुका है उसी पर यक़ीं नहीं आता

ये मेरा दिल है कि मंज़र उजाड़ बस्ती का
खुले हुए हैं सभी दर मकीं नहीं आता

बिछड़ना है तो बिछड़ जा इसी दो-राहे पर
कि मोड़ आगे सफ़र में कहीं नहीं आता

2 दिन पहले

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