आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Saleem Kausar Poetry: समुंदर चाँदनी में रक़्स करता है

उर्दू अदब
                
                                                         
                            समुंदर चाँदनी में रक़्स करता है 
                                                                 
                            
परिंदे बादलों में छुप के कैसे गुनगुनाते हैं 
ज़मीं के भेद जैसे चाँद तारों को बताते हैं 
हवा सरगोशियों के जाल बुनती है 
तुम्हें फ़ुर्सत मिले तो देखना 
लहरों में इक कश्ती है 
और कश्ती में इक तन्हा मुसाफ़िर है 
मुसाफ़िर के लबों पर वापसी के गीत 
लहरों की सुबुक-गामी में ढलते 
दास्ताँ कहते 
जज़ीरों में कहीं बहते 
पुराने साहिलों पर गूँजते रहते 
किसी माँझी के नग़्मों से गले मिल कर पलटते हैं 
तुम्हारी याद का सफ़्हा उलटते हैं 
अभी कुछ रात बाक़ी है 
तुम्हारा और मेरा साथ बाक़ी है 
अंधेरों में छुपा इक रौशनी का हाथ बाक़ी है 
चले आना 
कि हम उस आने वाली सुब्ह को इक साथ देखेंगे 

2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर