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साग़र आज़मी: फूलों से बदन उन के काँटे हैं ज़बानों में

saghar azmi famous ghazal phoolon se badan un ke kante hain zabanon mein
                
                                                         
                            


फूलों से बदन उन के काँटे हैं ज़बानों में
शीशे के हैं दरवाज़े पत्थर की दुकानों में

कश्मीर की वादी में बे-पर्दा जो निकले हो
क्या आग लगाओगे बर्फ़ीली चटानों में

बस एक ही ठोकर से गिर जाएँगी दीवारें
आहिस्ता ज़रा चलिए शीशे के मकानों में

अल्लाह-रे मजबूरी बिकने के लिए अब भी
सामान-ए-तबस्सुम है अश्कों की दुकानों में

आने को है फिर शायद तूफ़ान नया कोई
सहमे हुए बैठे हैं लोग अपने मकानों में

शोहरत की फ़ज़ाओं में इतना न उड़ो 'साग़र'
परवाज़ न खो जाए इन ऊँची उड़ानों में

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3 महीने पहले

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