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Hindi Ghazal: रामावतार त्यागी की 2 बेहतरीन ग़ज़लें

उर्दू अदब
                
                                                         
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वही टूटा हुआ दर्पण बराबर याद आता है 
उदासी और आंसू का स्वयंवर याद आता है 

कभी जब जगमगाते दीप गंगा पर टहलते हैं 
किसी सुकुमार सपने का मुक़द्दर याद आता है 

महल से जब सवालों के सही उत्तर नहीं मिलते 
मुझे वह गांव का भीगा हुआ घर याद आता है 

सुगंधित ये चरण, मेरा महक से भर गया आंगन 
अकेले में मगर रूठा महावर याद आता है 

समंदर के किनारे चांदनी में बैठ जाता हूं
उभरते शोर में डूबा हुआ स्वर याद आता है 

झुका जो देवता के द्वार पर वह शीश पावन है 
मुझे घायल मगर वह अनझुका सर याद आता है 

कभी जब साफ़ नीयत आदमी की बात चलती है 
वही 'त्यागी' बड़ा बदनाम अकसर याद आता है 

2- 

पूरी हुई उमीद भी अब तो कहीं चलो 
तुम हो चुके शहीद भी अब तो कहीं चलो 

तुम ने किया था ख़ून तब अपने वजूद का 
था एक चश्म-दीद भी अब तो कहीं चलो 

तुम को ख़ुदा के नाम पे लाए थे जो यहाँ 
वो जा चुके मुरीद भी अब तो कहीं चलो 

कल तक तुम्हारी आँख से जो देखते थे लोग 
दुश्वार उन की दीद भी अब तो कहीं चलो 
एक वर्ष पहले

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