आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Qateel Shifai Poetry: हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ, शीशे के महल बना रहा हूँ

उर्दू अदब
                
                                                                                 
                            हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ 
                                                                                                

शीशे के महल बना रहा हूँ 

सीने में मिरे है मोम का दिल 
सूरज से बदन छुपा रहा हूँ 

महरूम-ए-नज़र है जो ज़माना 
आईना उसे दिखा रहा हूँ 

अहबाब को दे रहा हूँ धोका 
हरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ 

दरिया-ए-फ़ुरात है ये दुनिया 
प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ  आगे पढ़ें

2 months ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X