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आयुष चराग़: दीदी भारत नहीं बल्कि सारे जग की रत्ना थीं

कविता
                
                                                         
                            इस  बासंती ऋतु  में यह क्या  सूझा परम पिता को, 
                                                                 
                            
सुरविहीन कर छोड़ गया प्राणों का विहग 'लता' को। 

दशकों जिसने गीत सुना कर सदियों की निधि दी है, 
विधि  ने  उसकी  क़ीमत  हम  सुननेवालों  से  ली है। 

यह  परलोक  गमन सब  के  सीने की टीस हुआ है, 
स्वर्ग  आज  धरती से  निश्चित ही इक्कीस हुआ है। 

हर  संगीत  साधिका  के  उर में  पलता सपना थीं, 
दीदी  भारत  नहीं  बल्कि  सारे  जग की रत्ना थीं। 

देखो  आ  इक  बार  अंततः  हुआ  वही कल्याणी, 
सारे  लोग  वतन  के  भर  लाये  आँखों  में  पानी।  आगे पढ़ें

4 वर्ष पहले

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