आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नज़ीर अकबराबादी: पर उनके और ही लच्छन हैं जब लेते हैं अवतार जनम

nazeer akbarabdi ki krishna par kavita hai rteet janam ki yon hoti
                
                                                         
                            
है रीत जनम की यों होती, जिस घर में बाला होता है।
उस मंडल में हर मन भीतर सुख चैन दोबाला होता है॥
सब बात बिथा की भूले हैं, जब भोला-भाला होता है।
आनन्द मंदीले बाजत हैं, नित भवन उजाला होता है॥
यों नेक नछत्तर लेते हैं, इस दुनियां में संसार जनम।
पर उनके और ही लच्छन हैं जब लेते हैं अवतार जनम॥1॥

सुभ साअ़त से यों दुनिया में अवतार गरभ में आते हैं।
जो नारद मुनि हैं ध्यान भले सब उनका भेद बताते हैं।
वह नेक महूरत से जिस दम इस सृष्टि में जन्मे जाते हैं।
जो लीला रचनी होती है वह रूप यह जा दिखलाते हैं॥
यों देखने में और कहने में, वह रूप तो बाले होते हैं।
पर बाले ही पन में उनके उपकार निराले होते हैं॥2॥

यह बात कही जो मैंने, अब यों समझो इसको ध्यान लगा।
है पण्डित पुस्तक बीच लिखा, था कंस जो राजा मथुरा का॥
धन ढेर बहुत बल तेज निपट, सामान अनेक और डील बड़ा।
गज और तुरंग अच्छे नीके अम्बारी होदे जीन सजा॥
जब बन ठन ऊंचे हस्ती पर, वह पापी आन निकलता था।
सब साज़ झलाझल करता था, और संग कटक दल चलता था॥3॥

एक रोज़ जो अपने भुज बल पर, वह कंस बहुत मग़रूर हुआ।
और हंस कर बोला दुनियां में, है दूजा कौन बली मुझ सा॥
एक बान लगाकर पर्बत को, चाहूं तो अभी दूं पल में गिरा।
इस देस के बड़ बल जितने हैं, है कौन जो मुझसे होवे सिवा॥
जो दुष्ट कोई आ जुद्ध करे, कब मो पर वाका ज़ोर चले।
वह सामने मेरे ऐसा हो, जों चींटी हाथी पांव तले॥4॥

वह ऐसे ऐसे कितने ही, जो बोल गर्व के कहता था।
सब लोग सभा के सुनते थे, क्या ताब जो बोले कोई ज़रा॥
था एक पुरुष वह यों बोला, तू भूला अपने बल पर क्या?।
जो तेरा मारन हारा है, सो वह भी जनम अब लेवेगा॥
तू अपने बल पर हे मूरख, इस आन अबस अहंकार किया।
वह तुझको मार गिरावेगा यों, जैसे भुनगा मार लिया॥5॥

यह बात सुनी जब कंस ने वां, तब सुनकर उसके होश उड़े।
भय मन के भीतर आन भरा और बोल गरब सिगरे बिसरे॥
यों पूछा वह किस देस में है और कौन भवन आकर जन्मे।
कौन उसके मात पिता होवे, जो पालें उसको चाहत से॥
वह बोला मथुरा नगरी में, एक रोज़ जनम वह पावेगा।
जब स्याना होगा तब तुझको एक पल में मार गिरावेगा॥6॥

यह बात सुनाई कंस को फिर, फिर आठ लकीरें वां खींची।
बसुदेव पिता का नाम कहा, और देवकी माता ठहराई॥
उन आठ लकीरों की बातें, फिर कंस को उसने समझाई।
सब छोरा छोरी देवकी के, हैं जग में होते आठ यों ही॥
बल तेज गरब में तूने तो, सब कारज ज्ञान बिसारा है।
जो पाछे रेखा खींची है, वह तेरा मारन हारा है॥7॥

इस बात को सुनकर कंस बहुत, तब मन में अपने घबराया।
जब नारद मुनि उस पास गए, तब उनसे उसने भेद कहा॥
तब नारद मुनि ने भी उसको, कुछ और तरह से समझाया।
फिर कंस को वां इस बात सिवा कुछ और न मारग बन आया॥
जो अपनी जान बचाने का कर सोच यह उसने फंद किया।
बुलवा बसुदेव और देवकी को, एक मन्दिर भीतर बंद किया॥8॥
आगे पढ़ें

3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर