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मलाज़ नक़वी: अब तो नहीं रहा मुझे ख़्वाबों पे ए'तिबार

malaz naqvi famous ghazal ab toh nahi raha mujhe khwabon mein aitbaar
                
                                                         
                            

अब तो नहीं रहा मुझे ख़्वाबों पे ए'तिबार
करने लगा हूँ जागती आँखों पे ए'तिबार

तुम को नहीं पता है कि क्या मो'जिज़ा हुआ
दरिया को हो गया है किनारों पे ए'तिबार

बैठे हैं धूप में वो चराग़ाँ किए हुए
होता नहीं है जिन को किताबों पे ए'तिबार

जब रास्ते ज़मीं के दिखाई न दें तुम्हें
इक बार कर के देखो सितारों पे ए'तिबार

डरने लगे हैं वक़्त के हाकिम बड़े बड़े
करने लगे हैं लोग सवालों पे ए'तिबार

कोई 'मलाज़' अपना निगहबाँ नहीं रहा
करते रहेंगे अपनी ही ग़ज़लों पे ए'तिबार

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8 घंटे पहले

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