बदायूं ज़िले की पैदाइश होने के कारण शकील ने अपने नाम में जोड़ा बदायूंनी और शकील बदायूंनी अदब की दुनिया के एक जाने-माने नाम हो गए। पिता ने हिंदी, उर्दू, फ़ारसी और अरबी की शिक्षा-व्यवस्था घर में ही कर दी थी। शहर के वातावरण और एक शायर रिश्तेदार की सोहबत में उनका झुकाव शायरी की ओर हुआ। इसके बाद कॉलेज के मुशायरों में भाग लेते, पढ़ाई ख़त्म करने के बाद दिल्ली में आपूर्ति अधिकारी के तौर पर आए लेकिन मुशायरों में आना-जाना ज़ारी रहा।
शकील बदायूंनी के समय पर लोग समाज के तमाम वर्गों की आवाज़ उठाते, क्रान्तिकारी कविताएं लिखने लगे थे लेकिन इसके इतर शकील के कलाम मुहब्ब्त व इश्क़ की बातें करते थे। 1944 में फ़िल्मों में लेखन के लिए वे मुंबई चले गए। वहां नौशाद अली से मुलाक़ात हुई, शकील की लेखनी से प्रभावित होकर नौशाद ने ए आर करदार की फ़िल्म दर्द में लिखने का मौका दिया। उसके गाने हिट हो गए और उसके साथ ही सुपरहिट हो गयी नौशाद और शकील बदायूंनी का जोड़ी भी।
शकील ने हिंदी सिनेमा को एक से एक बढ़कर एक गीत तो दिए ही साथ ही कई भजन भी लिखे।
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फ़िल्म: बैजू बावरा (1952)
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