पता नहीं किस गम में वे अपने हाथों को मलते हैं
बीते लम्हे सूनी आंखों से आंसू बन कर ढलते हैं
छड़ी पुरानी टूट गई आंखों का चश्मा फूट गया
पांव नहीं चलने देते दीवाल पकड़ कर चलते हैं
सबको बाबूजी लगते हैं जिस दिन पेंशन आती है
बाकी दिन बहुओं के तानों को सुन सुन कर जलते हैं
दुख का ज्वार उमड़ता है जब उनकी पागल आंखों में
स्वर्ग गई अम्मा की फोटो से बतियाया करते हैं
हाल चाल लेने को उनका बेटे पास नहीं आते
खूब जानते हैं उनके बेटे बहुओं से डरते हैं
जीते हैं पर जीने का अहसास नहीं उनको होता
घुट घुट कर जीने वाले ना जीते हैं ना मरते हैं
मौत उन्हें दे देना यारब उनकी भरी जवानी में
जो बूढ़ा हो कर औलादों के टुकड़ों पर पलते हैं
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