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Kaifi Azmi Poetry: कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल 'यूँही कोई मिल गया था सर-ए-राह चलते चलते'

kaifi azmi poetry yoon hi koi mil gaya tha sar e raah chalte chalte
                
                                                         
                            


यूँही कोई मिल गया था सर-ए-राह चलते चलते
वहीं थम के रह गई है मिरी रात ढलते ढलते

जो कही गई है मुझ से वो ज़माना कह रहा है
कि फ़साना बन गई है मिरी बात टलते टलते

शब-ए-इंतिज़ार आख़िर कभी होगी मुख़्तसर भी
ये चराग़ बुझ रहे हैं मिरे साथ जलते जलते


2 वर्ष पहले

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