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Urdu Poetry: इब्ने-इंशा की नज़्म 'जो अपना हो नहीं सकता है, उस शख़्स को अपना देखा है'

ibn e insha famous urdu nazm kal humne sapna dekha hai
                
                                                         
                            

कल हम ने सपना देखा है
जो अपना हो नहीं सकता है
उस शख़्स को अपना देखा है

वो शख़्स कि जिस की ख़ातिर हम
इस देस फिरें उस देस फिरें
जोगी का बना कर भेस फिरें
चाहत के निराले गीत लिखें
जी मोहने वाले गीत लिखें
धरती के महकते बाग़ों से
कलियों की झोली भर लाएँ
अम्बर के सजीले मंडल से
तारों की डोली भर लाएँ

हाँ किस के लिए सब उस के लिए
वो जिस के लब पर टेसू हैं
वो जिस के नैनाँ आहू हैं
जो ख़ार भी है और ख़ुश्बू भी
जो दर्द भी है और दारू भी
वो अल्लहड़ सी वो चंचल सी
वो शायर सी वो पागल सी
लोग आप-ही-आप समझ जाएँ
हम नाम न उस का बतलाएँ
ऐ देखने वालो तुम ने भी
उस नार की पीत की आँचों में
इस दिल का तीना देखा है?
कल हम ने सपना देखा है

2 वर्ष पहले

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