रात कुछ तारीक भी है और कुछ रौशन भी है
वक़्त के माथे पे शोख़ी भी है भोला-पन भी है
बाम-ओ-दर पर आज मिट्टी के दिए हैं इस तरह
आसमानों पर सितारे जगमगाएँ जिस तरह
रास्तों पर हैं दनादन की सदाएँ ख़ौफ़नाक
ज़िंदगी से मौत गोया कर रही है ताक-झाँक
हो रही हैं हर गली-कूचे में आतिश-बाज़ियाँ
आर रहा है अब्र की सूरत तमव्वुल का धुआँ
कर रहे हैं लक्ष्मी-पूजन भी घरों में साहूकार
देव दौलत को समझ बैठे हैं रब्ब-ए-इक़्तिदार
हिन्द वालों को मरज़ है नारवा तक़लीद का
आज घर में सेठ-जी भी खेल लेते हैं जुआ
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