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Firaq Gorakhpuri shayari: फ़िराक़ के ख़ज़ाने से चुनिंदा शेर

उर्दू अदब
                
                                                         
                            उसी दिल की क़िस्मत में तन्हाइयाँ थीं 
                                                                 
                            
कभी जिस ने अपना पराया न जाना 

दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँ आई 
कि जगमगा उठें जिस तरह मंदिरों में चराग़ 

जिन की ता'मीर इश्क़ करता है 
कौन रहता है उन मकानों में

तर्क-ए-मोहब्बत करने वालो कौन ऐसा जुग जीत लिया 
इश्क़ से पहले के दिन सोचो कौन बड़ा सुख होता था 

ज़ुल्मत ओ नूर में कुछ भी न मोहब्बत को मिला 
आज तक एक धुँदलके का समाँ है कि जो था 

'फ़िराक़' दौड़ गई रूह सी ज़माने में 
कहाँ का दर्द भरा था मिरे फ़साने में 
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2 वर्ष पहले

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