उसी दिल की क़िस्मत में तन्हाइयाँ थीं
कभी जिस ने अपना पराया न जाना
दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँ आई
कि जगमगा उठें जिस तरह मंदिरों में चराग़
जिन की ता'मीर इश्क़ करता है
कौन रहता है उन मकानों में
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