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दुष्यंत कुमार: अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए

उर्दू अदब
                
                                                         
                            अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए
                                                                 
                            
तेरी सहर हो मेरा आफ़ताब हो जाए

हुज़ूर! आरिज़ो-ओ-रुख़सार क्या तमाम बदन
मेरी सुनो तो मुजस्सिम गुलाब हो जाए

उठा के फेंक दो खिड़की से साग़र-ओ-मीना
ये तिशनगी जो तुम्हें दस्तयाब हो जाए

वो बात कितनी भली है जो आप करते हैं
सुनो तो सीने की धड़कन रबाब हो जाए

बहुत क़रीब न आओ यक़ीं नहीं होगा
ये आरज़ू भी अगर कामयाब हो जाए

ग़लत कहूँ तो मेरी आक़बत बिगड़ती है
जो सच कहूँ तो ख़ुदी बेनक़ाब हो जाए। 

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4 महीने पहले

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