फ़सीह-उल-मुल्क नवाब मिर्ज़ा दाग़ वो महान शायर हैं जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल को उसकी निराशा से निकाल कर मुहब्बत के वो तराने गाए जो उर्दू ग़ज़ल के लिए नए थे, उनसे पहले ग़ज़ल विरह की तड़प से या फिर कल्पना की बेलगाम उड़ानों से लिखी हुई थी। दाग देहलवी ने उर्दू का इतना सहज इस्तेमाल किया कि अवाम के प्रिय शायर हो गए।
उनका जीवन भी उनके नाम की तरह ही दर्द, जख्म और बेदखली की बानगी से भरा है। नई शैली सारे हिन्दोस्तान में इतनी लोकप्रिय हुई कि हज़ारों लोगों ने उसकी पैरवी की और उनके शागिर्द बन गए। दाग़ का असल नाम इब्राहीम था लेकिन वो नवाब मिर्ज़ा ख़ान के नाम से जाने गए। दाग़ की शायरी एक धुरी पर घूमती है और वो है इश्क़! यौन प्रेम के बावजूद उन्होंने ने आशिक़ाना जज़्बात का भरम रखा है और मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि की अभिव्यक्ति उनके यहां जगह जगह मिलता है।
दाग की ज़िंदगी और उनकी शायरी दोनों ही ऐसे फलसफों से भरी है। प्रस्तुत है दाग़ देहलवी के इश्क़िया शेर
हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
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