माना कि ग़ैर-मरगूब तजुर्बों की महज़ तारीख है यह ज़िंदगी
हसरतों की आजमाईश में ही सही, चलो यूं गुजर तो जाएगी
ज़िंदगी की परख में पाई कड़वाहट में भी कहीं खुदाई रज़ा है
इश्क में किसी पे मर उम्रक़ैद पा जाना ज्यों मुहमांगी सज़ा है
इल्म है कि ख्वाब झूठे हैं और ख्वाहिशों की ताबीर भी अधूरी
जीने की चाह में मगर कहीं गलतफहमियाँ भी तो हैं जरूरी
बेशक बेवफा तक़दीर बखील और काहिल है मेहरबानी में
नाकामियों के बस्ते में अलबत्ता हमने पैबंद भी लगे देखे हैं
ज़िंदगी को फिर से आजमाने की चाह ने बेशक दम नहीं तोड़ा
ईमान से, यही सुना है हमनें कि खुदा के यहाँ देर है अंधेर नहीं
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