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अमीर मीनाई: वो एक ग़ज़ल जिसने इस शायर को अमर कर दिया

ameer minai famous ghazal sarakti jaaye hai rukh se naqaab ahista ahista
                
                                                         
                            यूं तो तमाम कलाकार अपनी ज़िंदगी में कितनी ही रचना करते हैं, सब बाकमाल फिर भी लोक किसी एक रचना को इतना मशहूर कर देता है कि फिर कलाकार का नाम याद करते ही सबसे पहले उसकी वही कृति याद आती है। अमीर मीनाई 19वीं सदी के प्रसिद्ध उर्दू कवि हैं। उन्होंने 22 किताबें लिखीं, जिनमें 4 काव्य-संग्रह हैं। लेकिन एक ग़ज़ल ऐसी है जिसे जगजीत सिंह ने भी गाया और वो हमेशा के लिए लोगों के मन में चस्पा हो गई। शायद ही कोई कविता-प्रेमी होगा जिसने वो ग़ज़ल नहीं सुनी होगी। ग़ज़ल है
                                                                 
                            

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा
हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता

शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तो अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना
दबे होंटों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता

वो बेदर्दी से सर काटें 'अमीर' और मैं कहूँ उन से
हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता 



 
एक वर्ष पहले

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