जो मिलते वो तो इतना पूछता मैं
कि तुम हो बेवफ़ा या बेवफ़ा मैं
ये हालत हो गई मरते ही मेरे
कभी दुनिया ही में गोया न था मैं
ख़ुदा जाने वो समझे या न समझे
इशारों में बहुत कुछ कह गया मैं
मुसाफ़िर बन के आख़िर ये खुला राज़
हूँ मंज़िल मैं सफ़र मैं रहनुमा मैं
सर-ए-मंज़िल हमारा क़ाफ़िला है
कहाँ अल्लाह जाने रह गया मैं
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